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कलेक्टर जनदर्शन में गूंजा श्रमिकों के शोषण का मुद्दा: आर.के. एस. ठेका कंपनी पर लगे गंभीर आरोप, विधिक जांच शुरू

छत्तीसगढ़

कलेक्टर जनदर्शन में गूंजा श्रमिकों के शोषण का मुद्दा: आर.के. एस. ठेका कंपनी पर लगे गंभीर आरोप, विधिक जांच शुरू

रायगढ़:- एस ई सी एल छाल उपक्षेत्र में कार्यरत आर. के. एस. ठेका कंपनी से संबद्ध श्रमिकों द्वारा कथित आर्थिक शोषण, अवैध धन-संकलन तथा भयादोहन के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। प्रकरण को सामूहिक अभ्यावेदन के माध्यम से कलेक्टर जनदर्शन में प्रस्तुत किया गया है,
तथ्यों के अनुसार, पूर्व में संबंधित श्रमिक स्वतंत्र रूप से कार्य निष्पादित कर रहे थे। तत्पश्चात क्षेत्रीय राजनीतिक पृष्ठभूमि से संबद्ध कुछ व्यक्तियों द्वारा “ मजदूर एकता सेवा समिति, छाल” नामक संगठन का गठन किया गया। गठन के समय श्रमिकों को यह आश्वासन प्रदान किया गया कि उक्त संगठन उनके वैधानिक अधिकारों के संरक्षण, सेवा-शर्तों के परिष्कार तथा श्रम-संबंधी विवादों के निराकरण हेतु प्रतिबद्ध रहेगा।
तथाकथित “संगठनात्मक व्यय” के नाम पर अधिरोपित प्रति श्रमिक संगठन के नाम पर दो वर्ष पूर्व एक मुश्त5000 रुपये राशि ली गई तदोपरांत 500 रुपये प्रतिमाह अंशदान निर्धारित किया गया, जिसे बाद में एकपक्षीय रूप से 700 रुपये प्रतिमाह कर दिया गया।
श्रमिकों का यह भी कथन है कि निरंतर अंशदान के बावजूद संगठन द्वारा आय-व्यय का समुचित लेखा-जोखा, ऑडिट प्रतिवेदन अथवा वित्तीय प्रकटीकरण प्रस्तुत नहीं किया गया, जो कि सहकारी अथवा पंजीकृत संगठनों के लिए अपेक्षित वैधानिक दायित्वों के अंतर्गत आता है। जब कुछ श्रमिकों द्वारा वित्तीय पारदर्शिता के संबंध में स्पष्टीकरण की मांग की गई, तब उन्हें सेवा से पृथक्करण, कार्य से वंचन अथवा अप्रत्यक्ष उत्पीड़न की चेतावनी दी गई।
यदि आरोपों में तथ्यात्मक सत्यता पाई जाती है,
यह कृत्य भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत आपराधिक भयादोहन, जबरन वसूली तथा आपराधिक विश्वासभंग की परिधि में परीक्षणीय हो सकता है। साथ ही, श्रम कानूनों एवं औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के प्रावधानों के आलोक में भी यह प्रश्न विचारणीय होगा कि क्या श्रमिकों की स्वतंत्र संगठित अभिव्यक्ति एवं वैधानिक अधिकारों का हनन हुआ है।
प्रकरण की संवेदनशीलता को दृष्टिगत रखते हुए छाल तहसीलदार द्वारा प्राथमिक जांच प्रारंभ किए जाने की जानकारी प्राप्त हुई है। प्रशासनिक जांच के उपरांत ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आरोपों में कितनी विधिक प्रामाणिकता विद्यमान है तथा क्या संबंधित संगठन अथवा व्यक्तियों के विरुद्ध दंडात्मक अथवा वैधानिक कार्रवाई अपेक्षित है।

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