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रायगढ़ का रण: ‘कॉर्पोरेट’ की पदचाप या ‘आदिवासी’ की हुंकार? क्या कांग्रेस की ‘त्रिमूर्ति’ बचा पाएगी जल-जंगल-जमीन?

छत्तीसगढ़, रायगढ़

जय जोहार इंडिया TV न्यूज भारत के सबसे लोकप्रिय न्यूज नेटवर्क 

रायगढ़ का रण: ‘कॉर्पोरेट’ की पदचाप या ‘आदिवासी’ की हुंकार? क्या कांग्रेस की ‘त्रिमूर्ति’ बचा पाएगी जल-जंगल-जमीन?

 विकास की चकाचौंध या विनाश की आहट?

रायगढ़ जिला, जिसे कभी छत्तीसगढ़ का ‘औद्योगिक हृदय’ कहा जाता था, आज अपनी ही सांसों के लिए संघर्ष कर रहा है। यहाँ की हवा में अब कोयले की कालिख के साथ-साथ विस्थापन का डर भी घुलने लगा है। एक तरफ सत्ता के केंद्र बिंदु और हाई-प्रोफाइल मंत्री ओपी चौधरी का ‘विजनरी’ विकास है, तो दूसरी तरफ उमेश, लालजीत और विद्यावती की वो राजनीतिक साख है, जो आदिवासियों के ‘जल-जंगल-जमीन‘ के नारों पर टिकी है। क्या ये तीन विधायक सिर्फ विधानसभा में ‘कागजी शेर’ बनकर रह जाएंगे, या सड़क पर उतरकर आदिवासियों के आंसुओं का हिसाब मांगेंगे?

1. खरसिया का ‘बड़गड़ खोला’: उमेश पटेल के लिए ‘साख’ की अग्निपरीक्षा
नंदकुमार पटेल की विरासत को संभालने वाले उमेश पटेल आज अपने ही घर में घिरते नजर आ रहे हैं। खरसिया के ‘बड़गड़ खोला’ क्षेत्र के ग्रामीण आज आंदोलित हैं।
जमीनी हकीकत: यहाँ ग्रामीण उद्योगपतियों की घुसपैठ को अपनी संस्कृति पर हमला मान रहे हैं। सवाल यह है कि क्या उमेश पटेल केवल सोशल मीडिया पर विरोध जताएंगे, या अपने पिता की तरह जनता के बीच बैठकर सत्ता को चुनौती देंगे? खरसिया का किला तभी तक अभेद्य है, जब तक वहाँ का किसान और आदिवासी सुरक्षित है।
2. लैलूंगा का ‘तमनार’: विद्यावती सिदार की चुप्पी और सुलगते सवाल
तमनार का इलाका आज उद्योगों की बेतरतीब भूख का गवाह बना हुआ है। विद्यावती सिदार एक आदिवासी महिला विधायक हैं, जिनसे उम्मीद थी कि वे अपनी बहनों और भाइयों की ज़मीन छिनने पर ढाल बनेंगी।
 जब तमनार की जनसुनवाइयों में पुलिसिया बल और कॉर्पोरेट दबाव की खबरें आती हैं, तब लैलूंगा की विधायक क्या वे आदिवासियों की ‘दहाड़’ बनेंगी या सत्ता के रसूख के आगे उनका नेतृत्व फीका पड़ जाएगा?
3. धरमजयगढ़ का ‘पुरुंगा’: लालजीत राठिया और विरासत का दबाव
धरमजयगढ़ के पुरुंगा में हालिया जनसुनवाई के दौरान हुआ भारी विरोध महज एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि आदिवासियों का ‘अंतिम विद्रोह’ था। तीन बार के विधायक लालजीत सिंह राठिया के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई है।
 जनसुनवाई का विरोध स्पष्ट करता है कि आदिवासियों को अब ‘विकास’ शब्द से ही डर लगने लगा है। राठिया को समझना होगा कि अगर पुरुंगा की ज़मीन गई, तो उनकी राजनीतिक ज़मीन भी खिसकने में देर नहीं लगेगी।

विपक्ष की ‘त्रिमूर्ति’ बनाम ओपी चौधरी का ‘सिस्टम’

रायगढ़ की राजनीति में ओपी चौधरी एक तरफ ‘सुपरफास्ट विकास’ और ‘इन्वेस्टमेंट’ के प्रतीक बने हुए हैं, लेकिन उनका यही मॉडल आदिवासियों के लिए विस्थापन का पर्याय बनता जा रहा है।
आरोप है कि प्रशासन का पूरा तंत्र उद्योगपतियों के रेड कारपेट बिछाने में लगा है। ऐसे में कांग्रेस के तीनों विधायकों—उमेश, लालजीत और विद्यावती—के पास खोने के लिए बहुत कुछ है। यदि वे आज सड़क पर नहीं उतरे, तो 2028 तक रायगढ़ की राजनीति का भूगोल और आदिवासियों का भरोसा, दोनों बदल चुका होगा।

 रायगढ़ की पुकार

रायगढ़ अब केवल कोयला और लोहा पैदा करने वाली मशीन नहीं रहना चाहता। यहाँ का आदिवासी अपनी पहचान और अपनी पुश्तैनी ज़मीन चाहता है। कांग्रेस की इस ‘त्रिमूर्ति’ के पास मौका है कि वे सत्ता के गलियारों से बाहर निकलकर ‘पावर हब’ की असली ताकत—जनता—के साथ खड़े हों। वरना, इतिहास गवाह है कि जब ज़मीन हाथ से जाती है, तो जनमत भी साथ छोड़ देता है।

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