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बहेरामार में सात दिनों तक बही भागवत कथा की अविरल धारा, भक्ति के रंग में डूबा जनमानस

छत्तीसगढ़

बहेरामार में सात दिनों तक बही भागवत कथा की अविरल धारा, भक्ति के रंग में डूबा जनमानस

​छाल : श्री कृष्णचन्द्र भगवान एवं राधा रानी की असीम कृपा से छाल तहसील के ग्राम बहेरामार में श्रीमदभागवत कथा का भव्य आयोजन संपन्न हुआ। 04 अप्रैल 2026 से शुरू हुई इस पावन कथा गंगा ने पूरे क्षेत्र को धर्ममय कर दिया। तपती धूप के बावजूद ग्रामीणों और आसपास के श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखा गया। आयोजन के अंतिम चरणों में कृष्ण-सुदामा प्रसंग को सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।

मार्मिक रहा कृष्ण-सुदामा मिलन का प्रसंग

​व्यासपीठ पर आसीन राष्ट्रीय भागवताचार्य पंडित रमाकांत जी महाराज ने कृष्ण-सुदामा की निस्वार्थ मित्रता का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान केवल प्रेम के भूखे हैं, वस्तु के नहीं। उन्होंने सुदामा की दीन दशा का वर्णन करते हुए सुनाया— “देखि सुदामा की दीन दशा, करुणा करिके करुणानिधि रोये।” महाराज जी ने बताया कि किस तरह भगवान ने सुदामा के लाए कच्चे चावलों को बड़े प्रेम से खाया और बिना मांगे ही उन्हें दो लोकों की संपत्ति दान कर दी। यह प्रसंग मित्रता और निष्काम भक्ति की पराकाष्ठा है।

सात दिनों की आध्यात्मिक यात्रा: प्रमुख प्रसंग

​कथा के दौरान प्रतिदिन विभिन्न धार्मिक प्रसंगों का सजीव वर्णन किया गया:

​04 अप्रैल: भव्य कलश यात्रा के साथ कथा का शुभारंभ।

​05 अप्रैल: महाभारत कथा, परीक्षित श्राप एवं सुखदेव जी के आगमन का मार्मिक वर्णन।

​06 अप्रैल: सती प्रसंग एवं ध्रुव चरित्र की कथा सुनाई गई।

​07 अप्रैल: वामन अवतार, रामावतार एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की मनमोहक झांकी।

​08 अप्रैल: बाललीला, माखन चोरी और गोवर्धन पूजा (इंद्र का मान मर्दन) का प्रसंग।

​09 अप्रैल: रासलीला, कंस वध एवं रुक्मणी-कृष्ण विवाह का भव्य आयोजन।

मृत्यु का भय त्यागकर ‘अभय’ बने राजा परीक्षित

​महाराज जी ने राजा परीक्षित और सुखदेव मुनि के संवाद के माध्यम से जीवन का सार समझाया। उन्होंने कहा कि मृत्यु केवल शरीर का धर्म है, आत्मा अजर-अमर है। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करता है, वैसे ही आत्मा शरीर बदलती है। परीक्षित ने सात दिनों तक अन्न-जल त्यागकर केवल ‘कथा अमृत’ का पान किया, जो यह सिद्ध करता है कि एकाग्र श्रद्धा से ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है।

महाराज जी का संदेश: “मन को ईश्वर की ओर मोड़ना ही सच्ची भक्ति”

​पंडित रमाकांत जी महाराज ने छत्तीसगढ़ी और हिंदी के सरल मिश्रण से संगीत के माध्यम से ग्रामीणों को प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि:

“कलियुग में कठिन तपस्या संभव नहीं है, केवल भगवान का नाम लेना ही पर्याप्त है। ईश्वर की प्राप्ति के लिए घर-बार छोड़ना जरूरी नहीं, बस अपने मन को संसार से हटाकर ईश्वर की ओर मोड़ना जरूरी है।”

श्रद्धा का जनसैलाब:

इस धार्मिक आयोजन में ग्राम बहेरामार सहित छाल क्षेत्र के हजारों महिला-पुरुषों ने हिस्सा लिया। भीषण गर्मी भी भक्तों की आस्था को डिगा नहीं सकी। ग्रामीणों ने कथा को न केवल सुना, बल्कि उसे अपने जीवन में आत्मसात करने का संकल्प भी लिया।

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