औपचारिकता में सिमटी शांति समिति की बैठक बंद कमरे में चंद खास लोगों के बीच शांति की खानापूर्ति
छाल:-होली रंगों का पर्व तो वहीं दूसरी ओर बोर्ड का एक्जाम इस बीच तालमेल बैठा रंगों का पर्व होली को शान्ति व सोहाद्र पूर्ण ढंग से मनाने को लेकर प्रसासनिक अधिकारी त्यौहार से पूर्व लोगों को कानून व्यवस्था बनाये रखते हुए शन्ति पूर्ण ढंग से त्यौहार मनाने को लेकर गाइडलाइन जारी कर गांव गांव के हर लोगों तक पहुचाने को लेकर बैठक आहूत की गई।किन्तु छाल क्षेत्र में थाना प्रभारी व तहसीलदार आगामी होली पर्व को शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराने के लिए प्रशासन द्वारा आयोजित की जाने वाली शांति समिति की बैठक छाल क्षेत्र में व्यापक जनभागीदारी और पारदर्शिता के साथ करने के बजाय, बंद कमरे में गिनती के लोगों के बीच औपचारिकता निभाकर पूरा कर लिया।अगर बात करते हैं छाल थाना क्षेत्र कि तो छाल थाना क्षेत्र के अंतर्गत कुल 52 गांव आते हैं। होली जैसे संवेदनशील पर्व पर सुरक्षा व्यवस्था और आपसी भाईचारे के लिए इन गांवों के जनप्रतिनिधियों का शामिल होना अनिवार्य होता है। हैरानी की बात यह है कि क्षेत्र के सबसे संवेदनशील माने जाने वाले ग्राम बरभोन और कुड़ेकेला जैसे गांवों के सरपंच या किसी भी प्रमुख प्रतिनिधि को इस बैठक की भनक तक नहीं लगी।
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारों को भी इस बैठक से दूर रखा गया। आमतौर पर शांति समिति की बैठक में मीडिया को इसलिए बुलाया जाता है ताकि प्रशासन की बात जन-जन तक पहुंचे, लेकिन छाल में अधिकारियों ने परहेज का रास्ता चुना। क्षेत्र में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या यह बैठक उच्च अधिकारियों के दिशा-निर्देशों के पालन के लिए थी या सिर्फ अपने चहेतों को खुश करने और कागजी कोरम पूरा करने का एक जरिया मात्र थी।क्या गिनती के लोगों के साथ बैठक कर 52 गांवों में शांति व्यवस्था सुनिश्चित की जा सकती है।संवेदनशील गांवों के जनप्रतिनिधियों को सूचना न देना प्रशासन की लापरवाही है या सोची-समझी रणनीति।
बंद कमरे में हुई इस बैठक की गोपनीयता के पीछे का वास्तविक उद्देश्य क्या था
ग्रामीणों और स्थानीय प्रतिनिधियों में इस कार्यप्रणाली को लेकर गहरा रोष व्याप्त है। अब देखना यह होगा कि क्या उच्च अधिकारी इस नाममात्र की बैठक का संज्ञान लेते हैं या होली की सुरक्षा भगवान भरोसे ही रहेगी।