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पांचवीं अनुसूची और PESA कानून को ठेंगा? सरगुजा में कोयला खनन के खिलाफ सर्व आदिवासी समाज का हल्लाबोल”

छत्तीसगढ़, सरगुजा

जय जोहार इंडिया TV न्यूज भारत के सबसे लोकप्रिय न्यूज नेटवर्क 

 

SECL की माइनिंग पर ‘संवैधानिक’ संग्राम: सरगुजा में भड़का आदिवासियों का आक्रोश, 22 गांवों के विस्थापन के खिलाफ आर-पार की जंग!

“जल, जंगल, जमीन और अस्मिता के लिए ‘जय संविधान’: मदनपुर में उमड़ा हजारों ग्रामीणों का सैलाब”

“पांचवीं अनुसूची और PESA कानून को ठेंगा? सरगुजा में कोयला खनन के खिलाफ सर्व आदिवासी समाज का हल्लाबोल”

विवाद की वजह: SECL (साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड) की प्रस्तावित कोयला खनन परियोजना, जिससे 22 गांव प्रभावित हो रहे हैं।

महापंचायत की गूंज: शनिवार, 17 मई 2026 को सर्व आदिवासी समाज का संभाग स्तरीय महासम्मेलन।

संवैधानिक सवाल: संविधान की पांचवीं अनुसूची, अनुच्छेद 244 और पेसा (PESA) कानून के उल्लंघन का गंभीर आरोप।

“छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर आ रही है। विकास की अंधी दौड़ और आदिवासियों के अस्तित्व के बीच एक बार फिर ठन गई है। सूरजपुर जिले के मदनपुर में SECL की प्रस्तावित कोयला खदान परियोजना के खिलाफ हजारों आदिवासियों ने हुंकार भर दी है। सर्व आदिवासी समाज के बैनर तले आयोजित संभाग स्तरीय सम्मेलन में ग्रामीणों ने साफ कर दिया है—’जान दे देंगे, लेकिन जमीन नहीं देंगे।'”

“दरअसल, SECL इस क्षेत्र के करीब 22 गांवों को माइनिंग के दायरे में लाने की तैयारी कर रहा है। लेकिन इस तैयारी ने सदियों से जल, जंगल और जमीन पर रह रहे मूल निवासियों की रातों की नींद उड़ा दी है। शनिवार को मदन नगर में हुए महासम्मेलन में जो भीड़ उमड़ी, उसने साफ कर दिया कि यह लड़ाई अब आर-पार की हो चुकी है।”

⚖️ ‘संविधान’ बनाम ‘कोयला खनन’: क्या हैं कानूनी पेच?

सम्मेलन में वक्ताओं और कानूनी जानकारों ने सीधे तौर पर केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों को कटघरे में खड़ा किया। आदिवासियों का आरोप है कि इस पूरी परियोजना में संवैधानिक प्रक्रियाओं को ताक पर रख दिया गया है:

अनुच्छेद 244 और पांचवीं अनुसूची: सरगुजा संभाग एक अनुसूचित क्षेत्र है, जहां आदिवासियों की जमीन और संस्कृति को विशेष संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है।

पेसा (PESA) कानून 1996 की अनदेखी: नियमों के मुताबिक, ऐसे क्षेत्रों में बिना ‘ग्राम सभा’ की स्पष्ट सहमति के कोई भी भूमि अधिग्रहण या विकास परियोजना शुरू नहीं की जा सकती। ग्रामीणों का आरोप है कि यहां जनसहमति को बाईपास किया जा रहा है।

वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006: पारंपरिक वनवासियों के अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी देने वाले इस कानून का मदनपुर में खुला उल्लंघन होने का दावा किया जा रहा है।

🗣️ “यह सिर्फ जमीन नहीं, हमारी आत्मा का सवाल है”

“यह संघर्ष केवल जमीन का एक टुकड़ा बचाने का नहीं है। यह हमारी अस्मिता, हमारी संस्कृति और हमारे पूर्वजों की धरोहर की रक्षा का संघर्ष है। अगर सरकार ने असंवैधानिक तरीके से या बलपूर्वक हमें विस्थापित करने की कोशिश की, तो सर्व आदिवासी समाज लोकतांत्रिक तरीके से इसका करारा जवाब देगा।”

— सुभाष परते (प्रांतीय अध्यक्ष, सर्व आदिवासी समाज युवा प्रभाग)

📋 महासम्मेलन से उठीं 6 बड़ी मांगें

ग्रामीणों और सामाजिक प्रतिनिधियों ने प्रशासन के सामने अपनी मांगें स्पष्ट कर दी हैं:

क्र.सं. प्रमुख मांगें

1 ग्राम सभाओं की लिखित सहमति के बिना किसी भी माइनिंग प्रोजेक्ट पर तुरंत रोक लगाई जाए।

2 पेसा (PESA) कानून और वन अधिकार अधिनियम (FRA) का अक्षरशः पालन हो।

3 किसी भी कदम से पहले पूरी तरह से पारदर्शी पुनर्वास और रोजगार नीति को सार्वजनिक किया जाए।

4 आदिवासियों के सांस्कृतिक, धार्मिक स्थलों और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो।

5 बंद कमरों के बजाय स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की मौजूदगी में खुली जनसुनवाई हो।

6 संविधान प्रदत्त अधिकारों की रक्षा के लिए एक स्वतंत्र निगरानी कमेटी का गठन किया जाए।

✊ ‘जय आदिवासी-जय संविधान’ के नारों से गूंजा सरगुजा

इस सम्मेलन में न केवल बुजुर्ग और महिलाएं शामिल हुईं, बल्कि युवाओं की भारी मौजूदगी ने इस आंदोलन को एक नई वैचारिक धार दी है। संभागीय अध्यक्ष राजा क्षितिज सिंह, डॉ. अमृत मारवी, आर.एन. टेकाम, बीपीएस पोया और सत्यनारायण पैकरा जैसे दिग्गज आदिवासी नेताओं ने युवाओं से अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने की अपील की।

“सम्मेलन का समापन ‘जय आदिवासी – जय संविधान’ के गगनभेदी नारों के साथ हुआ। साफ है कि हसदेव के बाद अब मदनपुर छत्तीसगढ़ में जल-जंगल-जमीन की जंग का नया केंद्र बनता जा रहा है। अब देखना यह होगा कि SECL और प्रशासन इस जन-आक्रोश के बाद क्या कदम उठाते हैं।।

 

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