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सियासत की धूल में गुम हुई एडु छाल की सड़क, सरकारें बदलीं निजाम बदले पर नहीं बदली ग्रामीणों की बदहाली

छत्तीसगढ़

सियासत की धूल में गुम हुई एडु छाल की सड़क, सरकारें बदलीं निजाम बदले पर नहीं बदली ग्रामीणों की बदहाली

छाल :- कहते हैं कि सड़कें विकास की भाग्यरेखा होती है लेकिन छाल क्षेत्र के ग्रामीणों के लिए यही भाग्यरेखा आज काली रेखा बन चुकी है। प्रदेश में सत्ता के गलियारे बदले मुख्यमंत्री बदले और वादों की फेहरिस्त भी बदली लेकिन अगर कुछ नहीं बदला तो वह है एडु से छाल के बीच की बदहाल सड़क। करोड़ों की लागत से खरसिया धरमजयगढ़ मुख्यमार्ग का कायाकल्प तो हो गया लेकिन इस बीच का एक टुकड़ा विभाग और ठेकेदार की याददाश्त से ऐसे ओझल हुआ कि आज हजारों लोग धूल के गुब्बारों के बीच अपनी किस्मत को कोस रहे हैं।
विकास का अधूरा सच:- चकाचक हाईवे के बीच धूल का दरिया ​हैरानी की बात है कि जहां एक तरफ चमचमाती डामर की सड़कें बिछाई गईं वहीं एडु से छाल के बीच का हिस्सा आज भी नरक बना हुआ है। क्षेत्रीय लोगों का आरोप है कि विभाग और ठेकेदार की मिलीभगत के कारण इस टुकड़े को लावारिस छोड़ दिया गया है। आलम यह है कि यहाँ से गुजरने वाले राहगीर और आसपास रहने वाले ग्रामीण धूल स्नान करने को मजबूर हैं। श्वसन संबंधी बीमारियाँ घर कर रही है लेकिन जिम्मेदारों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही।
सर्वे पर सवाल:- क्या विभाग की आँखों पर बंधी थी पट्टी
​अब विभाग को अचानक दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ है कि यहाँ रोड सीमेंट कंक्रीट सड़क की आवश्यकता है।
ठेकेदार के आगे नतमस्तक विभाग :-
​चर्चा तो यहाँ तक है कि निर्माण एजेंसी और ठेकेदार के रसूख के आगे विभाग ने घुटने टेक दिए हैं। जिस सड़क को मुख्यमार्ग के साथ ही बन जाना चाहिए था उसे अब नए प्रपोजल और RCC की जरूरत के नाम पर लटकाया जा रहा है। सवाल यह है कि इस लेटलतीफी और गलत प्लानिंग की सजा क्षेत्र की जनता कब तक भुगतेगी।
सड़क सिर्फ पत्थर और डामर का टुकड़ा नहीं होती वह आम आदमी के जीवन की सुगमता का आधार है। एडु से छाल के बीच का यह धूल भरा सफर प्रशासनिक लापरवाही का जीता जागता स्मारक है। अगर वक्त रहते विभाग नहीं जागा तो आने वाले समय में यह धूल सत्तासीन लोगों की कुर्सी पर भी जम सकती है।
​अब देखना होगा कि कागजों पर दौड़ने वाला विकास एडु-छाल की इस धूल भरी सड़क पर कब तक उतरता है


शिवनाथ अकेला उपसरपंच खेदापाली :-​करोड़ों का एस्टीमेट बना और सर्वे हुआ तब क्या विभाग को इस जमीन की हकीकत नहीं पता थी​ क्या मेजरमेंट के वक्त इंजीनियरों ने अपनी आँखें बंद कर रखी थीं ​या फिर यह ठेकेदार के अड़ियल रवैये को फायदा पहुँचाने की कोई सोची समझी रणनीति है ​सड़क के नाम पर सरकारें बनीं और गिरीं चुनाव हुए और वादे हुए। पर धरातल पर सड़क आज भी एक सपना है। विभाग का अब जागना प्रशासनिक नाकामी का सबसे बड़ा सबूत है।

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