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629 वें कबीर प्रकटोत्सव विशेष लेख

कबीर: पाखंड के प्रचंड विध्वंसक, प्रेम के युग दृष्टा

629वें कबीर प्रकटोत्सव विशेष लेख

कबीर: पाखंड के प्रचंड विध्वंसक, प्रेम के युग दृष्टा

हिंदी साहित्य के युग-निर्माता आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने जब संत कबीर को _”वाणी का डिक्टेटर”_ कहकर संबोधित किया, तो वह केवल एक उपाधि नहीं, अपितु एक युग-सत्य की उद्घोषणा थी। सहस्राब्दियों के साहित्यिक इतिहास को मथ डालिए, कबीर जैसा अप्रतिम विचारक, निर्भीक समाज-सुधारक और क्रांतदर्शी कवि दूसरा नहीं मिलेगा।

वीरगाथा काल का रक्तरंजित अध्याय जब अपनी अंतिम साँसें गिन रहा था, जब राजाओं की निजी स्वार्थ-लिप्सा और उपनिवेशवादी मानसिकता ने समाज को मार-काट, दंगा-फसाद और हाहाकार की आग में झोंक दिया था, तब भक्तिकाल एक शीतल, पावन निर्झर बनकर प्रकट हुआ। सन् 1318 से 1643 तक के 325 वर्षों में कबीर, जायसी, सूर और तुलसी जैसे संत-कवियों ने भारतीय जन-मानस की चेतना को ही बदल डाला।

सूर और तुलसी ने श्रीकृष्ण एवं श्रीराम के सगुण-साकार रूप में प्रेम और मर्यादा की प्रतिष्ठा की, तो *संत कबीर और जायसी ने निर्गुण-निराकार ब्रह्म की ज्ञान-भक्ति और प्रेम-भक्ति की अलख जगाई।* कबीर की वाणी साखी, सबद और रमैनी के माध्यम से “बीजक” में संकलित होकर आज भी लोक-हृदय को झंकृत कर रही है।

*कबीर का मूल दर्शन ‘जागरण’ है।* उन्होंने ललकार कर कहा – _”सुखिया सब संसार है खाए और सोवे, दुखिया दास कबीर है जागे और सोवे।”_ जागना कोई हंसी-खेल नहीं है। यह रात-दिन का अनवरत संघर्ष है, कर्म के बल पर इष्ट की प्राप्ति है। इसीलिए संतों ने उद्घोष किया – _”जिन जागा तिन माणिक पाया।”_

*आज का विडंबनापूर्ण सत्य यह है* कि जिस कबीर ने जीवन-भर ढोंग, कुरीति, आडंबर और पाखंड का समूल नाश करने का बीड़ा उठाया था, उन्हीं के नाम पर आज पूरे विश्व में 252 पंथ संचालित हो रहे हैं। सबकी अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग। कोई ‘साहेब बंदगी’ कहता है, कोई ‘सत साहेब’। माला, तिलक, चंदन, टोपी – सब बहुरंगी। कबीर ने कहा था – _”तू कहता सब कागद लेखी, हों कहता निज आँखिन देखी।”_ पर आज कागद की लेखी ही प्रमाण बन गई है।

*कबीर की दृष्टि में “राम” ही एकमात्र ब्रह्म है,* जो सबको जगा रहा है। उनके चार स्वरूप हैं – _”आकार राम दशरथ घर डोलै, एक राम घट घट म बोलै। एक राम का सकल पसारा, एक राम त्रिभुवन से न्यारा।”_

*निष्कर्षतः कबीर का ‘प्रेम’ ही ईश्वर का शाश्वत स्वरूप है।* _”प्रेम न बाड़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए, राजा परजा जेहि रुचे सीस देहि ले जाए।”_ यही प्रेम घट-घट में विराजमान है। गोस्वामी तुलसीदास ने कहा – _”ईश्वर अंश जीव अविनाशी”_, तो कबीर ने हुंकार भरी – _”मोको कहां ढूंढे बन्दे मैं तो तेरे पास हूं।”_ सतनाम पंथ के प्रवर्तक बाबा गुरु घासीदास ने भी यही दोहराया – _”घट घट म बसे हे सतनाम, खोजे ले हंसा कहाँ पा बे रे।”_

*629वें प्रकटोत्सव पर हमारा संकल्प होना चाहिए* कि हम कबीर वाणी को सच्चे मन से आत्मसात करें। बाहरी आडंबर छोड़कर उस व्यापक ब्रह्म को अपने भीतर ही खोजें। क्योंकि _”तेरा साईं तुझ में ज्यों पपुहेन में बास, कस्तूरी का मिरग ज्यों फिरि फिरि ढूंढे घास।”_

*सच्ची कबीर जयंती तभी सार्थक होगी* जब हम ‘हंस’ बनकर मानसरोवर का मोती चुनेंगे, ‘बगुला’ बनकर मछली नहीं। जब हम जागकर उस शाश्वत, सत्य और जागृत ब्रह्म को जानेंगे, जो कबीर आज भी जन-मानस को जगा रहा है।

“साखी आँखी ज्ञान की, समझ देख मन माही। बिन साखी संसार का, झगरा छूटत नाही।”

कलमकार: रघुवीर दास महन्त
प्रदेश उपाध्यक्ष, भारतीय मानिकपुरी पनिका समाज, छत्तीसगढ़

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